
Jantar Mantar CJP Protest: जंतर-मंतर पर प्रदर्शन के बीच कई तस्वीरें सोशल मीडिया पर वायरल है. इसमें एक तस्वीर सादे कपड़ों में कुछ लोगों की भी है जो हाथों में लाठी लिए हुए पुलिस की तरफ से खड़े नजर आ रहे हैं. इस पर सवाल उठ रहे हैं. कई लोगों का सवाल है कि क्या पुलिसकर्मी और सुरक्षाबल किसी प्रदर्शन या दंगों में सादे कपड़े में तैनात हो सकते हैं? इसको लेकर नियम और कानून क्या है? प्रोटोकॉल क्या है?
किसी विरोध-प्रदर्शन या दंगों जैसी गंभीर स्थिति में क्या पुलिसकर्मी और सुरक्षा बल सादे कपड़ों यानी सिविल ड्रेस में तैनात हो सकते हैं? इसका जवाब है- हां, बिल्कुल हो सकते हैं. लेकिन इसके लिए कई कड़े नियम, कानून और एसओपी (स्टैंडर्ड ऑपरेटिंग प्रोसीजर) निर्धारित हैं. ऐसा इसलिए क्योंकि इसका दुरुपयोग ना हो और जनता की सुरक्षा भी बनी रहे. आइए, विस्तार से जानते हैं कि नियम-कानून और प्रोटोकॉल इस संबंध में क्या कहते हैं.
सादे कपड़ों में तैनाती का मकसद और रोल
भीड़ या विरोध-प्रदर्शनों में सादे कपड़ों में पुलिसकर्मियों को तैनात करने का मकसद कोई हमला करना या बल प्रयोग करना नहीं होता, बल्कि मुख्य रूप से इंटेलिजेंस यानी खुफिया जानकारी को जुटाना होता है. इसके पीछे के उद्देश्य भी होते हैं.
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अराजक तत्वों की पहचान: हिंसक भीड़ में छिपे उपद्रवियों, दंगा भड़काने वालों और आर्म्स लेकर घूमने वाले असामाजिक तत्वों की पहचान करना.
इंटेलिजेंस गैदरिंग: स्थिति की वास्तविक जानकारी मुख्य पुलिस कमांडर तक पहुंचाना, जिससे समय रहते सही फैसला लिया जा सके.
सबूत जुटाना: सादे कपड़ों में मौजूद टीम कई बार भीड़ के बीच रहकर गुप्त रूप से वीडियो और तस्वीरें लेती है, ताकि बाद में सबूतों के आधार पर कानूनी कार्रवाई की जा सके.
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इसके लिए कानूनी प्रावधान क्या है?
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भारतीय पुलिस और कानून व्यवस्था में सादे कपड़ों में ड्यूटी को लेकर स्पष्ट दिशा-निर्देश हैं. आइए समझते हैं.
पुलिस ऐक्ट और स्टेट पुलिस मैनुअल: राज्यों के अपने ‘पुलिस मैनुअल’ होते हैं. उदाहरण के लिए दिल्ली पुलिस, यूपी पुलिस या महाराष्ट्र पुलिस मैनुअल में अंडरकवर ड्यूटी या प्लेन क्लॉथ ड्यूटी का स्पष्ट तौर पर जिक्र होता है. लॉ एंड ऑर्डर बनाए रखने के लिए DCP, SP या कमिश्नर जैसे सीनियर अधिकारियों के पास विशेष परिस्थितियों में सादे कपड़ों में पुलिसकर्मियों की तैनाती का लिखित अधिकार होता है.
सीआरपीसी और बीएनएसएस: दंड प्रक्रिया संहिता (CrPC) और भारतीय नागरिक सुरक्षा संहिता (BNSS) के तहत पुलिस अधिकारियों को बिना वारंट के गिरफ्तार करने या शांति भंग होने से रोकने के अधिकार प्राप्त हैं. हालांकि अगर सादे कपड़ों में तैनात पुलिसकर्मी किसी को हिरासत में लेता है, तो उसे अपनी पहचान को तुरंत उजागर करना होता है.
क्या सादे कपड़ों में तैनात पुलिस लाठीचार्ज या बल प्रयोग कर सकती है?
इसको लेकर नियम बहुत सख्त हैं.
बल प्रयोग का अधिकार नहीं: सादे कपड़ों में तैनात पुलिसकर्मियों को सक्रिय बल प्रयोग जैसे लाठीचार्ज करना, आंसू गैस के गोले छोड़ना या फायरिंग करने की अनुमति आमतौर पर नहीं होती.
यूनिफॉर्म फोर्स का काम: लॉ एंड ऑर्डर को नियंत्रित करने और सीधे एक्शन लेने की जिम्मेदारी केवल यूनिफॉर्म पहने वर्दीधारी पुलिस बलों और पैरामिलिट्री जैसे रैपिड ऐक्शन फोर्स की होती है.
पहचान का संकट: अगर सादे कपड़ों में मौजूद लोग लाठी चलाने लगें, तो आम जनता और प्रदर्शनकारियों को यह पता नहीं चलेगा कि वे पुलिस वाले हैं या कोई असामाजिक तत्व. इससे स्थिति और बिगड़ सकती है.
खास परिस्थिति: अगर सादे कपड़ों में तैनात जवान पर सीधा जानलेवा हमला होता है, तो वह सेल्फ डिफेंस के अधिकार के तहत कार्रवाई कर सकता है लेकिन इसके लिए भी बाद में जवाबदेही तय होती है.
क्या कहते हैं प्रोटोकॉल और SOPs?
जब भी किसी बड़े प्रदर्शन में सादे कपड़ों में पुलिस भेजी जाती है, तो इन प्रोटोकॉल्स का पालन करना अनिवार्य होता है.
लिखित आदेश: किसी सीनियर पुलिस अधिकारी की लिखित मंजूरी और विशेष ब्रीफिंग के बाद ही ऐसी ड्यूटी लगाई जा सकती है.
आईडी कार्ड रखना अनिवार्य: सादे कपड़ों में तैनात पुलिसकर्मी के पास अपना आधिकारिक पुलिस पहचान पत्र होना ही चाहिए.
कम्युनिकेशन लिंक: ऐसे जवान लगातार कंट्रोल रूम और फील्ड कमांडर से वॉकी-टॉकी या सीक्रेट कोड्स के जरिए संपर्क में रहते हैं.
वर्दीधारी पुलिस के साथ तालमेल: वर्दी में तैनात पुलिस टीम को यह पता होना चाहिए कि भीड़ में उनके कौन से साथी सादे कपड़ों में मौजूद हैं, जिससे ‘फ्रेंडली फायर’ या पुलिस का आपस में ही भिड़ जाने का खतरा ना रहे.
मानवाधिकार आयोग और अदालतों का रुख क्या है?
सुप्रीम कोर्ट और राष्ट्रीय मानवाधिकार आयोग (NHRC) ने कई मामलों में स्पष्ट किया है कि कानून-व्यवस्था बनाए रखने के नाम पर पुलिस बिना पहचान बताए मनमानी नहीं कर सकती है. किसी नागरिक को अगर गिरफ्तार या हिरासत में लिया जाता है, तो सादे कपड़ों में मौजूद पुलिसकर्मी को सबसे पहले अपनी पहचान यानी नाम, बैज या आईडी वगैरह दिखाना होगा. पारदर्शी शासन और मानवाधिकारों की रक्षा के लिए प्रदर्शनों के दौरान मुख्य कंट्रोल वर्दीधारी पुलिस के हाथ में ही होना चाहिए.
प्रदर्शन या दंगे की स्थिति में पुलिस का सादे कपड़ों में मौजूद रहना कानूनन सही और रणनीति का हिस्सा है. लेकिन उनकी भूमिका केवल खुफिया जानकारी जुटाने और स्थिति पर नजर रखने तक सीमित होती है. भीड़ पर सीधा बल प्रयोग या लाठीचार्ज करने का काम हमेशा वर्दीधारी पुलिस ही कर सकती है.





