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लखनऊ उत्तर प्रदेश। हिंदी भाव की भाषा है .जिसे जैसी लिखी .वैसे समझी जाती है। सुनील यादव

हिंदी भाव की भाषा है जिसे जैसी लिखी, वैसे समझी जाती है :सुनील यादव

रिपोर्ट राजेश कुमार यादव

लखनऊ। फार्मासिस्ट एसोशिएशन के सुनील यादव नें हिन्दी दिवस पर कहा कि 1949 को भारत की संविधान सभा में हिंदी को केंद्र सरकार की आधिकारिक भाषा (राजभाषा) बनाए जाने का निर्णय हुआ था । इसे प्रसारित और मजबूत करने हेतु 14 सितम्बर को संपूर्ण भारत में हिंदी-दिवस के रूप में 1953 से मनाया जाने लगा ।

उन्होंने कहा कि हिंदी भाव की भाषा है जिसे जैसा लिखा, वैसा समझा जाता जाता है ।
हिंदी केवल एक मात्र भाषा नहीं, बल्कि भारतीय संस्कृति की आत्मा है। यह एक मधुर स्रोत की तरह है जिसमें गंगा की निर्मल धारा, सरस्वती की प्रज्ञा और यमुना की सौम्यता एक साथ प्रवाहित होती है। हिंदी का साहित्य लोकगीतों की सुगंध से लेकर काव्यों, महाकाव्यों की गंभीरता तक और आधुनिक कविता की सजीव संवेदनाओं से लेकर उपन्यासों की सामाजिक यथार्थवादिता तक फैला हुआ है। प्रेमचंद की कथनी, निराला की वाणी, महादेवी की करुणा और अज्ञेय की प्रयोगशीलता सहित अनेक हिंदी के मूर्धन्य लेखकों की रचनाएं हिंदी साहित्य को विश्व पटल पर गौरवान्वित करती हैं। हिंदी-दिवस हमें स्मरण कराता है कि भाषा केवल संचार का माध्यम नहीं, बल्कि आत्मा की अभिव्यक्ति और राष्ट्र की पहचान है।

सुनील यादव नें कहा कि आपको याद होगा कुछ दिनों पूर्व हिंदी की टाइपिंग सबसे कठिन मानी जाती थी, लेकिन आज इंटरनेट की दुनिया ने इसे काफी आसान बना दिया है, जिससे यह समझा जा सकता है कि हिंदी वैश्विक स्वीकार्यता की तरफ बढ़ चली है । वैश्विक युग में हिंदी का महत्व केवल साहित्यिक नहीं, बल्कि व्यावसायिक हो गया है। भारत विश्व की तीव्र गति से बढ़ती हुई अर्थव्यवस्था है और हिंदी विश्व की तीसरी सर्वाधिक बोली जाने वाली भाषा। व्यापार, उद्योग, बैंकिंग, ई-कॉमर्स, मीडिया और सूचना प्रौद्योगिकी के क्षेत्र में हिंदी का बढ़ता उपयोग इसे एक मजबूत व्यावसायिक उपकरण बना रहा है। सरकारी योजनाओं के प्रचार से लेकर डिजिटल प्लेटफॉर्म तक, हिंदी अब ब्रांडिंग और मार्केटिंग की वैश्विक भाषा बन रही है। ‘मेक इन इंडिया’, ‘डिजिटल इंडिया’ और ‘स्टार्टअप इंडिया’ जैसी योजनाएँ तभी व्यापक जनसमर्थन प्राप्त करती हैं जब वे हिंदी सहित भारतीय भाषाओं में जनता तक पहुँचती हैं।

संयोजन और संदेश
हिंदी दिवस हमें यह अवसर देता है कि हम हिंदी को केवल भावनात्मक गौरव का प्रतीक न मानें, बल्कि इसे ज्ञान-विज्ञान, तकनीक और व्यवसाय के साथ जोड़कर आत्मनिर्भर भारत की सशक्त धुरी बनाएँ। हिंदी का साहित्य हमारी संवेदनशीलता को गहराता है और व्यावसायिक हिंदी हमारे व्यावहारिक जीवन को सशक्त बनाती है।
इस अवसर पर हमारा संकल्प होना चाहिए—
“हिंदी को हम अपने हृदय की भाषा ही नहीं, बल्कि भविष्य की भाषा भी बनाएं ।”

मैने हिंदी में साहित्य रत्न का अध्ययन के दौरान इसकी व्यापकता को समझा ।

विभिन्न विश्वविद्यालय, शिक्षण संस्थान और संवर्गीय प्रशिक्षणों के दौरान मैंने व्यक्तिगत रूप से यह महसूस किया है कि हिंदी में दी गई जानकारी या प्रशिक्षण ज्यादा ग्राहय होता है । आइए हिंदी को अपनाएं, जीवंत बनाएं ।

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