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मीडिया समाज का प्रतिबिंब है


दर्पण और दृष्टा: पत्रकारिता के पतन में हमारी सामूहिक भागीदारी

## छवि का दोष या दृष्टि का भ्रम?

अक्सर कहा जाता है कि “मीडिया समाज का प्रतिबिंब है।” यदि प्रतिबिंब धुंधला या विकृत है, तो दोष केवल दर्पण का नहीं, बल्कि उसके सामने खड़े व्यक्ति की स्थिति का भी है। आज ‘मीडिया मर चुका है’ जैसे नारे लगाना एक सामाजिक फैशन बन गया है, लेकिन इस शोर के बीच यह कड़वा सच दब जाता है कि पत्रकारिता एक दोतरफा संवाद है। जो हम ‘खपत’ (consume) करते हैं, वही अंततः ‘उत्पादित’ (produce) किया जाता है।

1. आर्थिक वास्तविकता: विज्ञापनों और टीआरपी का चक्रव्यूह

आध्यात्मिक दृष्टिकोण से देखें तो कोई भी व्यवस्था ‘शून्य’ में नहीं चलती। न्यूज़ चैनल चलाना कोई परोपकार का कार्य नहीं, बल्कि एक जटिल कारोबारी सच्चाई है।

* इकोसिस्टम का सच: कर्मचारियों के वेतन से लेकर तकनीकी उपकरणों तक, भारी निवेश की आवश्यकता होती है।
* विज्ञापनों की सत्ता: पैसा विज्ञापनों से आता है, विज्ञापन टीआरपी पर टिके हैं, और टीआरपी सीधे तौर पर दर्शक के ध्यान (Attention) से जुड़ी है।
* सनसनी की मांग: जब गंभीर खबरों के बजाय दर्शक मनोरंजन और सनसनी को तवज्जो देते हैं, तो बाज़ार वही परोसता है जिसकी मांग है। टीआरपी खामोशी से नहीं, बल्कि हमारे रिमोट के बटनों से बढ़ती है।

2. फील्ड रिपोर्टर: श्रृंखला की सबसे कमजोर और निर्दोष कड़ी

दार्शनिक रूप से, हम अक्सर प्रभाव (Effect) को दोष देते हैं और कारण (Cause) को भूल जाते हैं। फील्ड रिपोर्टर वह व्यक्ति है जो ज़मीनी स्तर पर गालियां सुनता है, धमकियां झेलता है और हमलों का सामना करता है।

* शक्ति का केंद्र: रिपोर्टर न तो नैरेटिव (कथा) तय करता है और न ही अंतिम संपादन (Editing)।
* मैनेजमेंट का नियंत्रण: दिशा, फ्रेमिंग और प्राथमिकताएं ऊपर के प्रबंधन द्वारा तय की जाती हैं। रिपोर्टर अक्सर इस पूरी श्रृंखला में सबसे अधिक निर्दोष और विवश होता है।

3. जागरूक उपभोग: दर्शक की छिपी हुई शक्ति

सनातन दर्शन कहता है कि “जैसा अन्न, वैसा मन।” सूचना के संदर्भ में भी यही सत्य है। ‘इमेज मैनेजमेंट’ के इस दौर में असली चरित्र तब उजागर होता है जब हम अपने ‘कंटेंट’ का चुनाव करते हैं।

* आलोचना बनाम समर्थन: केवल मीडिया की बुराई करने से बदलाव नहीं आएगा। असली शक्ति ‘जागरूक उपभोग’ में है।
* नैतिकता का पोषण: यदि हम सार्थक कहानियों, नैतिक रिपोर्टिंग और जिम्मेदार पत्रकारिता को पढ़ते और शेयर करते हैं, तो हम उस इकोसिस्टम को आर्थिक रूप से व्यवहार्य (viable) बनाते हैं।

4. कड़वा सच: बेहतर समाज, बेहतर मीडिया

आज का मीडिया बदला हुआ दिखता है क्योंकि समाज की प्राथमिकताएं बदली हैं। हम “अच्छा दिखना चाहते हैं, अच्छा बनना नहीं।” यदि हमें स्वतंत्र और निष्पक्ष पत्रकारिता चाहिए, तो हमें ‘अच्छे दर्शक’ बनने का कठिन रास्ता चुनना होगा।

* साजिश बनाम सत्य: जिस तरह धर्म के नाम पर उलझाकर अमन चैन शांति और सुकून छीनी जा रही है, वैसे ही सनसनी के नाम पर उलझाकर हमारी ‘सोचने की शक्ति’ छीनी जा रही है।

## भविष्य का चुनाव हमारे हाथ में

मीडिया वह भविष्य है जिसे हम आज अपनी पसंद (Selection) से बुन रहे हैं। यदि हम चाहते हैं कि मीडिया जनहित के मुद्दों (जैसे भूमि अधिग्रहण, न्याय व्यवस्था में सुधार) पर बात करे, तो हमें उन खबरों को ‘व्यूज़’ और ‘सपोर्ट’ देना होगा।

अंतिम संदेश: पत्रकार को कटघरे में खड़ा करने से पहले, एक पल के लिए अपने ‘सर्च हिस्ट्री’ और ‘वॉच टाइम’ को देखना आवश्यक है। दर्पण तभी सुधरेगा जब दृष्टा अपनी दृष्टि बदलेगा।

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