वकील बेटी ने दी आईजी पिता को कानूनी टक्कर, इलाहाबाद हाईकोर्ट ने सिपाही की सेवा समाप्ति को किया रद्द
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रिपोर्ट राजेश कुमार यादव
दिनांक 11/8/2025
प्रयागराज उत्तर प्रदेश
रिश्ते जब न्याय की कसौटी पर परखे जाते हैं, तो कई बार कानून और भावनाओं के बीच टकराव भी देखने को मिलता है। ऐसा ही एक अनोखा मामला इलाहाबाद हाईकोर्ट में सामने आया, जब एक वकील बेटी ने अपने ही पिता — जो उत्तर प्रदेश पुलिस में आईजी के पद पर हैं — द्वारा एक सिपाही की सेवा समाप्ति के आदेश को अदालत में चुनौती दी और उसे निरस्त करवा दिया।
मामले के अनुसार, संबंधित सिपाही को विभागीय जांच के बिना, सीधे सेवा से बर्खास्त कर दिया गया था। यह आदेश आईजी स्तर के अधिकारी द्वारा पारित किया गया, जिनके खिलाफ ही वकील बेटी ने याचिका दायर कर न्याय की गुहार लगाई।
अदालत में पेश की गई दलीलें
याचिकाकर्ता वकील ने अदालत में स्पष्ट किया कि सिपाही को सेवा से हटाने की प्रक्रिया न केवल नियम विरुद्ध थी, बल्कि यह प्राकृतिक न्याय के सिद्धांतों का उल्लंघन भी करती थी। उन्होंने यह भी तर्क दिया कि सिपाही को न तो सुनवाई का अवसर दिया गया और न ही विभागीय जांच की गई, जिससे यह पूरा आदेश मनमाना और असंवैधानिक बन जाता है।
इस दौरान कोर्ट में यह तथ्य भी सामने आया कि आदेश पारित करने वाले अधिकारी, आईजी, याचिकाकर्ता के पिता हैं। हालांकि वकील बेटी ने व्यक्तिगत रिश्तों से ऊपर उठकर पेशेवर तटस्थता बनाए रखी और पूरी मजबूती से न्याय की लड़ाई लड़ी।
हाईकोर्ट का अहम फैसला
इलाहाबाद हाईकोर्ट की खंडपीठ ने मामले की गंभीरता को देखते हुए आदेश का गहन परीक्षण किया और पाया कि सेवा समाप्ति प्रक्रिया में “न्याय का पालन नहीं” किया गया। इसके आधार पर अदालत ने आदेश को रद्द करते हुए सिपाही को तत्काल प्रभाव से सेवा में पुनः बहाल करने के निर्देश दिए।
न्यायालय ने यह भी टिप्पणी की कि कोई भी अधिकारी, चाहे कितना भी उच्च पद पर क्यों न हो, उसे संविधान और नियमों का पालन करना अनिवार्य है।
समाज में बनी मिसाल
इस घटना ने न केवल कानून के समक्ष समानता की भावना को बल दिया, बल्कि यह भी सिद्ध किया कि जब बात न्याय की हो, तो रिश्तों की दीवारें भी टूट जाती हैं। वकील बेटी द्वारा पेश की गई यह मिसाल उन तमाम युवाओं के लिए प्रेरणा है जो अपने अधिकारों और न्याय के लिए खड़े होने से नहीं डरते।
न्याय और साहस की इस कहानी ने कानूनी जगत में एक नई मिसाल कायम की है — जहां रिश्ते नहीं, सिर्फ संविधान बोलता है।
