Site icon Bhoomika Bharat News

सच की चीख और मीडिया मौन लोकतंत्र का लहूलुहान आईना

सच की चीख और मीडिया का मौन: लोकतंत्र का लहूलुहान आईना

आज जब हर जेब में कैमरा है और हर हाथ में स्क्रीन, तब सबसे जरूरी सवाल यह नहीं है कि सूचना कहाँ से आ रही है — बल्कि यह है कि क्या वह सत्य है? विडंबना देखिए, जिस चौथे स्तंभ को लोकतंत्र की आँख और आत्मा माना जाता था, वही आज अंधी दौड़ और बेजान संवेदनशीलता का प्रतीक बनता जा रहा है।

मीडिया, जो कभी सत्ता से सवाल पूछने का औजार था, अब TRP और “नैरेटिव निर्माण” की प्रयोगशाला बन गया है। यह परिवर्तन केवल पेशेवर मूल्यहीनता नहीं है — यह लोकतंत्र की बुनियाद पर चोट है।

संपादन नहीं, एजेंडा चला रहा है मीडिया:

भारत के कई बड़े चैनलों और अखबारों की खबरों पर ध्यान दें — तो ऐसा प्रतीत होता है जैसे पत्रकार नहीं, प्रचारक बोल रहे हों। खबरों का चयन, हेडलाइन का टोन, डिबेट की भाषा — सब कुछ एक सोची-समझी दिशा की ओर इशारा करता है।

जैसे:

* प्रधानमंत्री कार्यालय में “गौ-माता” के दूध सेवन की मनगढ़ंत खबर, जिसे आरटीआई से पूरी तरह खारिज किया गया — फिर भी चैनलों पर “धार्मिक महिमा” की चर्चाएँ घंटों चलीं।
* शनि शिंगणापुर मंदिर में मुस्लिम कर्मचारियों की नियुक्ति की झूठी सनसनी, जिसने धार्मिक वैमनस्य को हवा दी।
इन खबरों की सत्यता की पुष्टि तो छोड़िए, खण्डन आने के बाद भी उन्हीं झूठों को गर्व से दोहराया गया।

यह सिर्फ पत्रकारिता की लापरवाही नहीं है। यह एक सुविचारित विकृति है — जहाँ खबर का ध्येय ‘जनजागरण’ नहीं, बल्कि ‘जनभावनाओं का शोषण’ बन चुका है।

लोकतंत्र की नींव पर सेंध:

जब मीडिया भ्रामक खबरें परोसता है, तब वह केवल एक गलती नहीं करता — वह नागरिकों को अंधकार में धकेलता है।
इसके तीन भीषण परिणाम होते हैं:

1. जनविश्वास का पतन – जब जनता को महसूस होता है कि उसे गुमराह किया जा रहा है, तो वह किसी भी खबर पर विश्वास करना बंद कर देती है।
2. सामाजिक ध्रुवीकरण – जाति, धर्म और राजनीति से जुड़ी अफवाहें समाज में नफरत का ज़हर घोलती हैं।
3. लोकतांत्रिक निर्णय की भ्रांति – जब मतदाता झूठी सूचनाओं के आधार पर निर्णय लेते हैं, तो लोकतंत्र केवल दिखावा बन जाता है।

कहाँ है जवाबदेही?

मीडिया की ऐसी घोर त्रुटियों के बाद न माफ़ी, न सज़ा, केवल ‘विवादों से घिरा’ एक रेखाचित्र रह जाता है।
प्रेस काउंसिल ऑफ इंडिया जैसी संस्थाएँ केवल “सलाह” देती हैं, और अदालतें जिस समय तक फैसला देती हैं, तब तक राजनीतिक लाभ उठा लिया जाता है, और समाज बँट चुका होता है।

क्या यह व्यवस्था पत्रकारों को “सच के बजाय सत्ता के प्रतिनिधि” बनने का लाइसेंस नहीं देती?

समाधान का रास्ता: आत्मनियमन नहीं, संरचित नियमन

अब केवल “मीडिया की आत्मा जागे” जैसी उम्मीदें बेमानी हो चुकी हैं। आवश्यकता है:

* एक स्वतंत्र मीडिया नियामक संस्था, जिसमें न केवल पत्रकार हों, बल्कि पूर्व न्यायाधीश, शिक्षाविद और नागरिक प्रतिनिधि भी शामिल हों।
* गलत रिपोर्टिंग पर कानूनी व आर्थिक दंड, जो न केवल माफ़ी बल्कि सार्वजनिक सुधार भी सुनिश्चित करें।
* नागरिक मीडिया साक्षरता अभियान, जिससे जनता झूठ और तथ्य में भेद करना सीख सके।

पत्रकारिता: पेशा या प्रायोजित तमाशा?

क्या यह समय नहीं आ गया है कि पत्रकारिता के भीतर झाँक कर पूछा जाए —

“क्या तुम सूचना दे रहे हो, या विचार थोप रहे हो?”
“क्या तुम्हारी माइक के पीछे सच्चाई है या साज़िश?”

जब तक यह आत्मचिंतन नहीं होता, तब तक मीडिया सिर्फ खबर नहीं, भ्रम फैलेगा। और भ्रम में जीता समाज, लोकतंत्र को कब्र तक ले जा सकता है।

अंतिम शब्द: हमें चुप नहीं रहना चाहिए

“यह सम्पादकीय केवल मीडिया की आलोचना नहीं है — यह एक जिम्मेदार समाज का आह्वान है।
सच की लड़ाई केवल पत्रकारों की नहीं — हर नागरिक की है। अगर हम चुप हैं, तो हम भी इस पतन में सहभागी हैं। क्योंकि कल जब सच गूंगा हो जाएगा, तब इतिहास केवल चिल्लाते झूठों को ही याद रखेगा।”

[contact-form][contact-field label=”Name” type=”name” required=”true” /][contact-field label=”Email” type=”email” required=”true” /][contact-field label=”Website” type=”url” /][contact-field label=”Message” type=”textarea” /][/contact-form] [contact-form][contact-field label=”Name” type=”name” required=”true” /][contact-field label=”Email” type=”email” required=”true” /][contact-field label=”Website” type=”url” /][contact-field label=”Message” type=”textarea” /][/contact-form] [contact-form][contact-field label=”Name” type=”name” required=”true” /][contact-field label=”Email” type=”email” required=”true” /][contact-field label=”Website” type=”url” /][contact-field label=”Message” type=”textarea” /][/contact-form]
Exit mobile version