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मतदाता मौन, उलझन में प्रत्याशी, आम कार्यकर्ताओं में निराशा के कारण नहीं बन पा रहा चुनावी माहौल

लोकसभा क्षेत्र का चुनाव काफी रोचक हो गया है, यहां विभिन्न राजनैतिक दलों के कोर मतदाता ही अपनी पार्टी से नाराज और किनारा कसते नजर आ रहे है। वही विभिन्न दलों से चुनाव लड़ रहे प्रत्याशी अपने कोर मतदाताओं तक पहुँचने की बात दूर, उनके संवाद तक नहीं हो पा रहा है।

चुनाव पूर्व श्रीराम मंदिर का प्राण प्रतिष्ठा होने के बाद लोगों में धर्म और हिंदुत्व को लेकर जो उमंग और उत्साह दिख था। तब यह लग रहा था कि आगामी चुनाव में भाजपा के सामने दूसरे दल का कोई नाम लेने वाला भी नहीं मिलेगा। लेकिन जैसे ही चुनाव का विगुल बजा वैसे ही मतदाताओं की खामोशी बढ़ने लगी। जिसे भांपने में राजनैतिक दल भले ही नाकाम हो रहे हो, पर राजनीतिक गणितज्ञ इसे बड़ा गम्भीर परिणाम मान रहे है। जिसकी बरगी क्षेत्र में विभिन्न राजनैतिक दलों द्वारा आयोजित होने वाले नुक्कड़ सभाओं में स्थानीय स्तर के मतदाताओं का हिस्सा न लेना बड़ा उदाहरण है। चुनाव के अंतिम दौर में यही चिंता राजनैतिक दलों और प्रत्याशियों की बेचैनी बढ़ा कर रख दिया है।

पिछले लोकसभा का चुनाव रहा हो या फिर विधानसभा का तब एक जबरजस्त लहर चल रही थी, गांव के चौपाल से लेकर कस्वे व नगर के चौक चौराहों पर राजनीतिक चर्चा विभिन्न दलों में उत्साह और जोश भरता रहा। लेकिन वर्तमान में अगर आप कहीं चुनाव की चर्चा करना चाहे तो भी लोग यह कह किनारा कर ले रहे कि नेता जनता के लिए नहीं अपने लाभ के लिए लड़ रहे। उस समय देखेगे जो समझ में आएगा उसे वोट कर देंगे। आम व जागरूक मतदाताओं की यहीं बात राजनैतिक दल हो या प्रत्याशी सभी को परेशान कर रहा है।

वेरोजगरी बड़ी समस्या बन गयी है, कुछ जागरूक लोगों ने चर्चा के दौरान यहां तक कह दिया कि यूपी के बच्चों को बिहार में सरकारी नौकरी आसानी से मिल गया, और यूपी में पेपर लीक पर ही जाकर मामला अटक जा रहा। ये वे लोग है जिनके बच्चे वर्षों से नौकरी के लिए प्रयास कर रहे थे, बिहार में भकेन्सी निकली और उनके सपने साकार हो गये।

यह क्षेत्र बिहार सीमा से लगा है, यहां के जनता के मिजाज को समझना बड़ा मुश्किल होता है, कई बार तो जनता कहती कुछ है और परिणाम आता कुछ और है। फिर भी आम मतदाताओ से बातचीत में जो कुछ भी निकल कर आ रहा वह सभी राजनैतिक दलों के लिए परेशानी का सबब अवश्य है।

लायन ऑडर को लेकर आम आदमी खुलकर बोल रहा। उनका स्पष्ट मानना है कि बड़े स्तर पर प्रदेश में लायन ऑडर काफी अच्छा है, उसे इसको लेकर जितनी उम्मीद नही थी, सरकार ने उतनी कर के दिखा दिया। लेकिन वह यह भी कहने से गुरेज नहीं कर रही कि निचले स्तर पर लायन ऑर्डर उतनी ही खराब है। उसने इसकी कल्पना भी नहीं कि थी।

राजनैतिक दलों में भी अंदर ही अंदर खूब खिंच तान चल रही। मंच से या फिर पार्टी के बैठक में स्थानीय नेता पार्टी संगठन या प्रत्याशी को जितना भी भरोसा दिला रहे हो, लेकिन अंदर ही अंदर काट छांट भी उसके दुगुने रफ्तार से चल रहा। पार्टी के कार्यकर्ता अपने बड़े नेताओं और प्रत्याशी को इसरो ही इसारो ने सब कुछ बताना चाहते है, लेकिन जमीनी स्तर के कार्यकर्ताओं की बात बड़े नेताओं के समझ में नहीं आ रही। ऐसे में पार्टी के निष्ठावान कार्यकर्ता चुप रहने में ही अपनी भलाई समझ रहे है। यहां गौर करने वाली एक बात और हैं। और वह यह कि बिना जनाधार वाले चमकदार कुर्ता पहने और दमदार वाणी वाले नेता व कार्यकर्ता को ज्यादे अहमियत दी जा रही। जो गांव से गली तंक काम करने वाले निष्ठावान व कर्मठ कार्यकर्ताओं को मायूस और चुप रहने पर मजबूर कर रहा।

यहां के हर चुनाव में जाति का बोलबाला रहता आया है, लेकिन अंतिम दौर में उसमें बिखराब देखने को हर बार मिला है, लेकिन इस बार के चुनाव में जाति समीकरण कुछ ज्यादे और मजबूती से अपने पक्ष में वकालत करता देखने को मिल रहा। कुछ ऐसी जातियां जो विभिन्न दलों की कोर मतदाता हुआ करती थी, उनके सामने दूसरे दल से उनके जाति के भी प्रत्याशी आ जाय तो वे डिगते नहीं थे। लेकिन इस चुनाव में जातियों का बिखराब बड़े स्तर पर देखने को मिल रहा। जो विभिन्न दलों के लिए चिंता का कारण बन गया है।

मतदाता विकास की चर्चा भी पूरी दमदारी से कर रहा, उनका मानना है कि दस वर्षों में अपेक्षा से अधिक जमीन पर विकास हुआ है। वहीं महंगाई को लेकर आम आदमी यह कहने में गुरेज नहीं कर रहा कि सरकार महंगाई पर लगाम लगाने में पूरी तरह विफल रही है। आम आदमी रसोई गैस, दाल, तेल, टमाटर, अदरक, लहसुन, डीजल, पेट्रौल तक की चर्चा करने से गुरेज नहीं कर रहा। उनकी माने तो महंगाई ने आम आदमी की कमर तोड़ कर रख दिया है।

सब मिलकर पिछले दो चुनावों में देवरिया लोकसभा क्षेत्र से भाजपा ने बड़े अंतर से चुनाव जीता था। लेकिन इस बार क्या होगा, इसको लेकर आम मतदाता स्पष्ट रूप से खुल कर कुछ भी नहीं कह रहा। जो खासकर भाजपा के लिए चिंता का विषय हो सकता है।

हाईजैक
क्षेत्र में प्रत्याशियों को हाईजैक करने जैसे तीर खूब छोड़े जा रहे। भाजपा और कांग्रेस दोनों ही पार्टियों के निष्ठावान और जमीनी कार्यकर्ताओं में इस बात की चर्चा खूब हो रही। आम आदमी खुलकर कह रही कि कुछ लोगों ने प्रत्याशी को हाईजैक कर रखा है। कुछ वरिष्ठ नेताओं और कार्यकर्ताओं ने खुलकर इस शर्त पर कहा कि मेरा नाम न आये। लेकिन आप यह जान ले कि प्रत्याशी हाईजैक हो गये है, उन्हें कुछ ही लोगों पर भरोसा है कि वही चुनाव जितवा देंगे। इसी लिए वे वही कर रहे जो वे कह रहे। हम लोग भी उतना ही काम कर रहे जितना संगठन कह रहा। बाकी सब राम भरोसे ही है। मतलब साफ है कि कार्यकर्ताओं को वह सम्मान नहीं मिल रहा, जो पहले मिलता था। या फिर उनके किसी भी बात पर गौर नहीं किया जा रहा जो चुनाव के लिहाज से पार्टी या प्रत्याशी के हित में अहम हो सकता है।

उक्त समीक्षा आम मतदाताओं से चुनाव को लेकर हुई बातचीत पर आधारित है। कल का चुनावी समीकरण क्या होगा। यह कल पर निर्भर करेगा।

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