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शब्दों का अंत ही अनुभूति की जननी- डॉ कंचन जैन 

शब्दों का अंत ही अनुभूति की जननी- डॉ कंचन जैन

 

जब एक मानसिक एवं शारीरिक रूप से स्वस्थ व्यक्ति शाब्दिक रूप से शांत हो जाता है और आंतरिक रूप से अनुभूति करना प्रारंभ कर देता है। तब वह सही मायने में ध्यान करना शुरू कर देता है।ऐसा व्यक्ति मानसिक एवं शारीरिक रूप से प्रकृति के प्रत्येक सजीव सृजन से संवेदनात्मक जुड़ाव को महसूस करना प्रारंभ कर देता है जोकि जीवन की सबसे आनंदमय यात्रा है। वह जल कि प्रत्येक बूंद का महत्व और मूल्य समझने लगता है। इस आंतरिक यात्रा में व्यक्ति जीवन की नवीनतम मूल्यों को जानने के प्रति जिज्ञासु रहता है एवं वह अपने भीतर एक सकारात्मक ऊर्जा की अनुभूति करने में सक्षम होता है। ऐसे व्यक्ति अपनी शाब्दिक कला को बहुत ही सराहनीय एवं संवेदनात्मक बना लेते हैं।

वह दूसरों की पीड़ा को समझने एवं किसी का उपहास ना बनाने के प्रति भी जागरूक रहते हैं। मनुष्य प्रकृति की सबसे अद्भुत कृति है जिसमें बुद्धि के साथ-साथ विवेक एवं एक साकार मन विद्यमान है। वैसे तो प्रकृति की हर कृति अद्भुत है फिर चाहे वह पशु हो, पक्षी हो, पेड़ हो, पौधे हो, फूल हो, फल हो, प्रकृति का हर अंश प्राकृतिक सुंदरता को दर्शाता है।

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