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जैन मुनि श्री 108 भूतबली सागर जी महाराज की समाधि आष्टा में हुई असाध्य रोग के कारण सल्लेखना से समाधि सम्पन्न हुई

भोपाल । रिपोर्टर देवेन्द्र कुमार जैन
वर्तमान के सबसे पुराने मुनि पद पर विराजमान 46 वर्ष प्राचीन मुनिराज संत शिरोमणि आचार्यश्री विद्यासागर महामुनिराज के शिष्य मुनिश्री भूतबलिसागर जी की आष्टा, जिला – सिहोर, मप्र में सल्लेखनापूर्वक समाधि हो गई। मुनिश्री के बचपन का नाम ब्र. भीमसेन भैय्याजी था। कर्नाटक के बेलगाम जिले में ही उनका जन्म हुआ। वे क्षुल्लक मणिभद्र महाराज के साथ अध्ययन के लिए आचार्य विद्यासागर के पास राजस्थान आए व आचार्यश्री के कर-कमलों से प्रथम ब्रह्मचर्य व्रत लिया। उनकी क्षुल्लक व ऐलक दीक्षा आचार्यश्री विद्यासागर जी के कर-कमलों से हुई, वे आचार्यश्री से दीक्षित प्रथम ऐलक भी थे, उस समय उनका नाम ऐलक दर्शनसागर जी रहा। तात्कालिक कारणों से उन्होंने 31 जनवरी 1980 में आचार्य विमलसागर से मुनिदीक्षा ली और दीक्षागुरु के संकेत पर आचार्यश्री विद्यासागर को ही अपना गुरू माना। दीक्षा के बाद मुनिश्री ने उत्तर से लेकर दक्षिण भारत तक जैन धर्म का प्रचार किया हजारों लोगों को सम्यक्त्व मार्ग की राह दिखाई। वर्तमान में उनके तीन मुनि शिष्य मुक्तिसागरजी, मौनसागरजी, मुनिसागरजी हैं। आष्टा में ही बुधवार को मुनिश्री की असाध्य रोग के कारण सल्लेखना से समाधि सम्पन्न हुई। मुनिश्री 45 वर्ष प्राचीन मुनि होकर भी कहीं पद आदि के लोभ में अन्य स्थान पर नहीं गए और ना ही किसी तरीके से मिथ्यात्व का पोषण किया। जहां – जहां भी मुनिश्री का प्रवास आदि रहा, वहां उन्होंने सम्यक मार्ग का प्रचार ही किया। अपने गुरु आचार्य विद्यासागर जी महाराज के अंतिम दर्शनों का सौभाग्य उन्हे सिद्धक्षेत्र नेमावर में 3 वर्ष पूर्व मिला था। मुनिराज की आत्मा कर्मों का क्षय कर रत्नत्रय के द्वारा सिद्धदशा प्रगटावें।

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